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डॉ. गीता रावत
सामाजिक विज्ञान विभाग
श्री गुरु राम राय विश्वविद्यालय
देहरादून, उत्तराखंड – 248001
ORCID ID: https://orcid.org/0009-0007-7163-9847
सारांश— भारत विश्व के सर्वाधिक भाषायी विविधता वाले देशों में गिना जाता है, जहाँ सैकड़ों लोकभाषाएँ और बोलियाँ शताब्दियों से मौखिक परंपरा, लोकगीत, लोककथा, कहावत और अनुष्ठान के माध्यम से सांस्कृतिक ज्ञान को संजोए हुए हैं। किंतु वैश्वीकरण, शहरीकरण, माध्यम-भाषाओं के प्रभुत्व और डिजिटल तकनीक के असमान वितरण के कारण अनेक लोकभाषाएँ आज संकटग्रस्त श्रेणी में पहुँच चुकी हैं। प्रस्तुत शोध पत्र भारतीय लोकभाषाओं में निहित सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण से जुड़ी समकालीन चुनौतियों और उपलब्ध संभावनाओं का समालोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इस अध्ययन में पीपुल्स लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया, यूनेस्को के संकटग्रस्त भाषाओं संबंधी एटलस, तथा हिंदी लोक साहित्य पर केंद्रित शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित सत्यापनीय शोध सामग्री का उपयोग किया गया है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि भारत में सैकड़ों भाषाएँ संकटग्रस्त श्रेणी में हैं, जिनमें से अधिकांश आदिवासी और जनजातीय समुदायों से संबंधित हैं, तथा इनके साथ जुड़ा मौखिक ज्ञान, लोकगीत और लोककथा-परंपरा भी क्षरण के कगार पर है। साथ ही, डिजिटलीकरण, शैक्षणिक संस्थानों की सक्रियता, सामुदायिक भागीदारी तथा राष्ट्रीय शिक्षा नीति में स्थानीय ज्ञान-परंपराओं को दिए गए महत्व से संरक्षण की नई संभावनाएँ भी उभर रही हैं। पत्र का निष्कर्ष यह है कि लोकभाषाओं में निहित सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण केवल भाषा-वैज्ञानिक कार्य नहीं, अपितु एक अंतःविषयी सामाजिक उत्तरदायित्व है, जिसके लिए समुदाय, शिक्षा तंत्र, सरकार और तकनीक के समन्वित प्रयास आवश्यक हैं।
बीज शब्द— लोकभाषा, सांस्कृतिक विरासत, संकटग्रस्त भाषाएँ, मौखिक परंपरा, लोक साहित्य, भाषायी विविधता, डिजिटलीकरण
संदर्भ सूची
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