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DOI: https://doi.org/10.63345/ijrsml.v14.i1.7
डॉ. पुष्प लता
राजकीय महाविद्यालय
बक्खा खेड़ा, उन्नाव
डॉ. विद्या चरण
असिस्टेंट प्रोफेसर – हिंदी
राजकीय महाविद्यालय
बक्खा खेड़ा, उन्नाव
स्त्रियों के उत्पीड़न और दासता का इतिहास उतना ही पुराना है, जितना असमानता और उत्पीड़न पर आधारित सामाजिक संरचनाओं के उद्भव और विकास का इतिहास। प्राचीन साहित्य में ढेरों मिथक और कथाएँ मौजूद हैं, जो पुरूष स्वामित्व की सामाजिक स्थिति के विरूद्व स्त्रियों के प्रतिरोध और विद्रोह का साक्ष्य प्रस्तुत करती हंै। स्त्रियों की दासता और दोयम दर्जे की सामाजिक स्थिति का कई स्त्री विचारकांे ने (और कुछ पुरूष विचारकों ने भी) प्राचीन काल में साहसिक एवं तर्कपूर्ण प्रतिवाद किया था, जिसके प्रमाण भारत और सम्पूर्ण विश्व के इतिहास और साहित्य में मिलते हैं।
यद्यपि मध्यकाल के शताब्दियों लम्बे गतिरोध के दौर में स्त्री मुक्ति की वैचारिक पीठिका तैयार करने की दिशा में प्रतिरोध की धारा भी अत्यन्त क्षीण रही, किन्तु आधुनिक विश्व इतिहास के उषाकाल में नवजागरण काल के पुरोधाओं और धर्म सुधार आन्दोलन ने पितृसत्तात्मकता की दारूण दासता के विरूद्ध स्त्री समुदाय में भी नई चेतना का बीजारोपण किया जो कि आगे चलकर स्पष्टतः दिखने लगा। परिणामतः जो देश औपनिवेशिक गुलामी के नीचे दबे होने के चलते मानवतावाद और तार्किक नवोन्मेष से अप्रभावित रहे और जहाँ इतिहास की गति कुछ मंथर रही, वहाँ भी नवजागरण और मुक्ति-संघर्ष काल में स्त्री समुदाय में अपनी मुक्ति की नई चेतना संचरित हुई।
नवजारणकाल में स्त्री-मुक्ति के प्रश्न को भारतीय संदर्भ में भली-भाँति समझने और उसे जन-मुक्ति के व्यापक प्रश्न से जोड़ने के लिए, अध्ययन व प्रयोग के अन्य बहुतेरे उपक्रमों के साथ-साथ इस प्रश्न की विश्व ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से अवगत होना भी बहुत ज़रूरी है।
संदर्भ ग्रन्थ
- मेरी वोल्सटनक्राफ्ट: स्त्री-मुक्ति की आदि-सिद्वान्तकार, पृष्ठ-12
- स्त्री संघर्ष का इतिहास, राधा कुमार, पृष्ठ-37
- स्त्री संघर्ष का इतिहास, राधा कुमार, पृष्ठ-39
- दुर्ग द्वार पर दस्तक, कात्यायनी, पृष्ठ -13
- बहुवचन- अक्टूबर-दिसम्बर 2009 अंक, पृष्ठ-196
- वही, पृष्ठ-196